देश में पशुओं की ख़राब हालत के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। हम सब मिलकर
प्रयास करने के बजाय एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं। कुछ सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं कुछ जनता जिम्मेदार है। पैरावेट जैसे ही हजारों लोगों को सरकार ने जानवरों की जान से खेलने का लाईसेन्स दे दिया है। पैरावेट पशुओं की सेवा के लिए रखे गए हैं परन्तु इस समय इनका काम पशुचिकित्सको की बुराई करके अपना उल्लू सीधा करना रह गया है। जो इलाज दस रुपये में हो सकता है उसे पैरावेट इतना खतरनाक बना देते हैं कि उसे हजारों रुपये खर्च करने पर भी ठीक नही किया जा सकता है जैसे थनैला रोग, गला घोंटू, एफेमेरल फीवर । पशुचिकित्सको की भरती के बिना पशुओं की हालत सुधरने की आशा करना बेकार है। इसके साथ ही जो स्नातक उच्च शिक्षा प्राप्त किए हैं उनको उचित सुविधाएं देकर उनकी शिक्षा एवं योग्यता का पूरा लाभ उठाना चाहिए। परन्तु दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर राज्यों में ऐसा नही है।
Thursday, June 26, 2008
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